एक सुबह, बुद्धिमान मंत्री विश्वनाथ दरबार में जाने की तैयारी कर रहे थे। तभी उनकी पाँच साल की बेटी नीला उनके पास आई और दृढ़ता से बोली, "पिताजी, आज मैं भी आपके साथ दरबार चलूँगी।"
विश्वनाथ को थोड़ा आश्चर्य हुआ। नीला आमतौर पर बहुत शांत स्वभाव की थी। उन्होंने प्यार से पूछा, "नीला, दरबार कोई खेलने की जगह नहीं है, वहाँ बहुत ज़रूरी काम होते हैं। तुम वहाँ क्यों जाना चाहती हो?"
नीला की आँखों में चमक थी। उसने कहा, "पिताजी, मैंने अभी तक महल नहीं देखा और न ही राजा से मिली हूँ। मैं देखना चाहती हूँ कि आप और राजा कैसे बातें करते हैं।"
नीला की जिज्ञासा देखकर विश्वनाथ उसे साथ ले गए। दरबार में राजा सिंह सिंहासन पर विराजमान थे। राजा ने छोटी सी नीला को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "विश्वनाथ, तुम्हारी बेटी बहुत प्यारी है! मैं उससे बात करना चाहता हूँ।"
ya राजा ने मज़ाक में पूछा, "नन्ही बच्ची, क्या तुम्हें पता है कि दरबार में कैसे बात की जाती है?"
नीला ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया, "महाराज, मुझे कम और सटीक बोलना आता है।"
दरबार में सन्नाटा छा गया। राजा ने उत्सुकता से पूछा, "कम और सटीक? वह कैसे संभव है?"
नीला ने बहुत ही समझदारी से समझाया, "महाराज, जब मैं बड़ों या विद्वानों के साथ होती हूँ, तो मैं बहुत कम बोलती हूँ। क्योंकि मैं उनसे बहुत कुछ सीखना चाहती हूँ और उनकी बातों को ध्यान से सुनना चाहती हूँ। लेकिन जब मैं अपने जैसे बच्चों के साथ होती हूँ, तो मैं बहुत ज़्यादा बोलती हूँ। क्योंकि मुझे उन्हें हर चीज़ विस्तार से समझानी पड़ती है।"
नीला की इस परिपक्वता को सुनकर राजा बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा, "विश्वनाथ, तुम्हारी बेटी में न केवल बोलने की कला है, बल्कि बहुत गहरी समझ भी है!" राजा ने नीला को उपहार दिए और विश्वनाथ को उनकी बेटी पर गर्व महसूस हुआ।
Moral
सही समय पर सुनना और सही समय पर बोलना ही असली बुद्धिमानी है।