एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। उसके पास एक छोटा सा खेत और कुछ बकरियाँ थीं। अर्जुन के सपने बहुत बड़े थे। एक दिन उसने अपने मित्र विक्रम से कहा, "चलो हम मिलकर एक बहुत बड़ा व्यापार शुरू करते हैं, हम बहुत अमीर बन जाएंगे!"
विक्रम ने उसे समझाया, "अर्जुन, सपने देखना अच्छी बात है, लेकिन बिना पर्याप्त धन के इतना बड़ा काम शुरू करना जोखिम भरा है।"
अर्जुन ने उसकी बात अनसुनी कर दी। उसने बड़ा कर्ज लिया और एक भव्य दुकान खोली। शुरुआत में सब कुछ ठीक लग रहा था, लेकिन अचानक बाजार में मंदी आ गई। अर्जुन के पास न तो बचत थी और न ही कोई अतिरिक्त धन। उसका सारा पैसा व्यापार की दिखावट में ही खत्म हो गया था। वह पूरी तरह टूट गया।
उस दिन उसे एक बड़ी बात समझ आई। पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर नीचे हाथियों का युद्ध देखना कितना आसान लगता है! वहाँ से देखने पर वह केवल एक रोमांचक दृश्य लगता है, लेकिन जो उस युद्ध के बीच में होते हैं, वे जानते हैं कि वह कितना खतरनाक है। ठीक वैसे ही, बिना धन के बड़ा काम शुरू करना बिना कवच के युद्ध में उतरने जैसा है। अर्जुन ने सीखा कि पहले धीरे-धीरे धन संचय करना चाहिए और फिर बड़े कदम उठाने चाहिए।