एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक युवक अपनी वृद्ध माँ के साथ रहता था। अर्जुन मेहनती था, लेकिन उसके मन में एक डर हमेशा बना रहता था। 'मैं अपना परिवार कैसे बसाऊँगा और उनकी ज़िम्मेदारी कैसे उठाऊँगा?' वह अक्सर यही सोचता था। एक बार गाँव में भीषण सूखा पड़ा। फसलें सूख गईं और खाने की कमी हो गई। अर्जुन बहुत निराश होकर बैठा था।
उसकी माँ उसके पास आई और बोली, 'बेटा, जब कोई व्यक्ति अपने परिवार को पालने और घर बसाने का पक्का इरादा कर लेता है, तो ईश्वर भी उसकी मदद के लिए किसी न किसी रूप में प्रकट हो जाता है। डरो मत।'
माँ की बात सुनकर अर्जुन के अंदर एक नई हिम्मत जागी। उसने हार मानने के बजाय, दूर की पहाड़ी से अपने खेत तक पानी लाने के लिए एक छोटी नहर खोदने का निर्णय लिया। उसने दिन-रात कड़ी मेहनत की। अंततः, उसकी मेहनत रंग लाई और पानी खेत तक पहुँच गया। उसकी फसल लहलहा उठी। जिस क्षण उसने अपने परिवार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी निष्ठा से स्वीकार किया, सफलता उसके पास किसी दैवीय आशीर्वाद की तरह खुद चलकर आई।