एक सुंदर से गाँव में तारा नाम की एक लड़की अपनी माँ के साथ रहती थी। तारा बहुत चुलबुली थी, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी। जब भी वह बाज़ार जाती, उसे कोई भी चमकती या रंगीन चीज़ दिखती, तो वह उसे पाने के लिए ज़िद करने लगती, चाहे उसकी ज़रूरत हो या न हो। उसकी रोना-धोना सुनकर उसकी माँ को अक्सर उसकी ज़िद माननी पड़ती थी।
एक शाम तारा और उसकी माँ बाज़ार घूम रहे थे। रास्ते में एक खिलौने की दुकान देखकर तारा चिल्लाई, "माँ, मुझे वह बड़ा खिलौना चाहिए!" माँ ने प्यार से समझाया, "तारा, तुम्हारे पास पहले से ही बहुत खिलौने हैं, इसकी क्या ज़रूरत है?" पर तारा नहीं मानी।
आगे बढ़ते हुए उन्होंने कांच के बर्तनों की एक दुकान देखी। वहाँ एक मटका रखा था जो बहुत ही सुंदर गुलाबी रंग में चमक रहा था। तारा की आँखें चमक उठीं, "माँ! देखो वह गुलाबी मटका कितना सुंदर है! मुझे वही चाहिए!" माँ ने कहा, "तारा, घर पर तुम्हारे पास पहले से ही बहुत मटके हैं। यह सिर्फ देखने में अच्छा है, काम का नहीं है।" लेकिन तारा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। अंत में, माँ को हार मानकर वह गुलाबी मटका खरीदना पड़ा।
घर लौटते समय तारा की पुरानी चप्पल टूट गई। अब उसे पथरीले रास्ते पर नंगे पैर चलना पड़ रहा था। पैरों में बहुत दर्द हो रहा था, लेकिन नए मटके की खुशी में वह चलती रही।
घर पहुँचकर तारा ने सोचा कि वह उस मटके में एक गुलाब का पौधा लगाएगी। उसने मटके के अंदर का पुराना गंदा पानी बाहर निकालने के लिए मटका झुकाया। जैसे ही पानी बाहर निकला, तारा दंग रह गई! वह मटका गुलाबी नहीं था, बल्कि एक साधारण कांच का मटका था! मटके के अंदर भरे रंगीन पानी की वजह से वह बाहर से गुलाबी दिख रहा था।
तारा फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी माँ ने उसे पास बिठाया और कहा, "तारा, यह तुम्हारे लिए एक सबक है। किसी भी चीज़ को सिर्फ उसकी सुंदरता देखकर नहीं खरीदना चाहिए। हमेशा यह सोचना चाहिए कि क्या वह चीज़ तुम्हारे काम की है। तुम उस रंग के मोह में पड़ गई और तुमने यह भी नहीं देखा कि वह असल में क्या है। अब देखो, एक बेकार मटके के लिए ज़िद करने के कारण तुम्हें नई चप्पलें भी नहीं मिल पाईं।"
तारा को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने माँ से वादा किया कि वह आगे से फालतू चीज़ों के लिए ज़िद नहीं करेगी। उस दिन से, तारा अपनी बचत को एक गुल्लक में जमा करने लगी।
Moral
केवल बाहरी चमक-धमक से धोखा न खाएं; हमेशा उपयोगी चीज़ों का चुनाव करें।