एक सुबह, कविन स्कूल जा रहा था कि तभी उसकी नज़र एक चमकती हुई लाल साइकिल पर पड़ी। वह साइकिल बहुत ही सुंदर और नई लग रही थी। कविन उसे देखते ही मंत्रमुग्ध होकर वहीं खड़ा हो गया।
तभी उस साइकिल का मालिक, अर्जुन, वहाँ आया। कविन को ध्यान से देखते हुए अर्जुन ने मुस्कुराकर पूछा, "छोटे भाई, क्या तुम्हें यह साइकिल पसंद आई?"
"हाँ भैया! यह बहुत ही शानदार है," कविन ने उत्साह से कहा।
अर्जुन ने प्यार से बताया, "यह मेरे बड़े भाई ने मुझे उपहार में दी है। क्या तुम भी बड़े होकर ऐसी ही साइकिल चाहते हो?"
कविन ने कुछ पल सोचा और फिर बहुत ही आत्मविश्वास के साथ कहा, "भैया, मुझे सिर्फ साइकिल नहीं चाहिए। मुझे आप जैसा एक बड़ा भाई चाहिए। जो मुझे केवल उपहार ही न दे, बल्कि मुझे सही रास्ता भी दिखाए। अगर मुझे आप जैसा भाई मिल जाए, तो मैं भी बड़ा होकर आपकी तरह एक नेक इंसान बनने की कोशिश करूँगा।"
कविन की इस समझदारी भरी बात को सुनकर अर्जुन दंग रह गया। उसे खुशी हुई कि एक छोटा बच्चा केवल खिलौनों के बारे में नहीं, बल्कि अच्छे संस्कारों और रिश्तों के बारे में सोच रहा है।
Moral
भौतिक वस्तुओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण अच्छे संस्कार और प्रेमपूर्ण संबंध होते हैं।