एक बहुत बड़ी कपड़ा मिल थी, जिसके मालिक सेठ धनीराम थे। मिल की बड़ी-बड़ी मशीनें हमेशा शोर करती हुई चलती रहती थीं। लेकिन एक दिन, अचानक मिल की सबसे मुख्य मशीन एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ रुक गई।
धनीराम बहुत परेशान हो गए। उन्होंने तुरंत कई मिस्त्री बुलाए। उन मिस्त्रियों ने मशीन के पुर्जे खोले, नट-बोल्ट बदले, लेकिन मशीन टस से मस नहीं हुई। मशीन बंद होने के कारण धनीराम का बहुत नुकसान हो रहा था।
अंत में, धनीराम ने शहर के सबसे पुराने और अनुभवी इंजीनियर, मास्टर जी को बुलाया। मास्टर जी बहुत शांत स्वभाव के थे। वे मशीन के पास आए और बिना किसी हड़बड़ी के, एक छोटे से लेंस की मदद से मशीन के हर कोने को ध्यान से देखने लगे। उन्होंने घंटों तक मशीन की आवाज़ सुनी और उसे महसूस किया।
काफी देर बाद, उन्होंने मशीन के एक कोने में लगे एक बहुत ही छोटे से पेंच (Screw) को बस थोड़ा सा घुमाया। और चमत्कार हो गया! मशीन फिर से गुनगुनाने लगी और काम करने लगी।
धनीराम बहुत खुश हुए, लेकिन जब मास्टर जी ने बिल दिया, तो उनके होश उड़ गए। बिल की राशि बहुत ज़्यादा थी। धनीराम ने गुस्से में कहा, "मास्टर जी, आपने तो बस एक छोटा सा पेंच घुमाया है! इसके लिए इतने पैसे? मुझे इसका पूरा हिसाब चाहिए!"
मास्टर जी ने मुस्कुराते हुए एक कागज़ दिया। उस पर लिखा था: 'उस छोटे पेंच की कीमत: ₹10. यह जानने की कीमत कि कौन सा पेंच घुमाना है और उसे कैसे घुमाना है, उस अनुभव और ज्ञान की कीमत: ₹9,990.'
धनीराम को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने समझ लिया कि वे केवल काम के लिए नहीं, बल्कि उस हुनर के लिए पैसे दे रहे हैं।
Moral
काम करने से ज़्यादा ज़रूरी है, काम को सही ढंग से करने का ज्ञान होना।