एक विशाल जहाज नीले समुद्र की लहरों पर तैर रहा था। उस जहाज पर चिंटू नाम का एक नटखट बंदर भी सवार था। अचानक मौसम बिगड़ गया और एक भयानक तूफान आया। जहाज डगमगाया और चिंटू फिसलकर गहरे समुद्र में गिर गया!
"बचाओ! कोई मुझे बचाओ!" चिंटू डर के मारे चिल्लाने लगा। जब वह डूबने ही वाला था, तभी एक प्यारी सी डॉल्फिन वहाँ आई। उसने चिंटू को अपनी पीठ पर बिठाया और तैरते हुए पास के एक छोटे से द्वीप पर ले गई।
तट पर पहुँचकर चिंटू ने चैन की सांस ली। उसने डॉल्फिन से पूछा, "शुक्रिया दोस्त! क्या तुम इस द्वीप के बारे में कुछ जानती हो? क्या यहाँ कोई और रहता है?"
डॉल्फिन मुस्कुराई और बोली, "इस द्वीप पर तुम्हारे सिवा कोई नहीं है। इसलिए, अब से तुम ही इस द्वीप के राजा हो!"
चिंटू हैरान होकर बोला, "लेकिन मैं राजा कैसे बन सकता हूँ?"
डॉल्फिन ने हंसते हुए कहा, "राजा वह होता है जिसका हुक्म चले। यहाँ तुम्हें रोकने वाला कोई नहीं है, इसलिए तुम ही यहाँ के शासक हो!" इतना कहकर डॉल्फिन पानी में कूद गई।
चिंटू ने चारों ओर देखा। वहाँ न कोई महल था, न कोई प्रजा। उसे समझ आया कि बिना दोस्तों और बिना किसी के साथ के, अकेले राजा बनने का कोई मतलब नहीं है। उसे अपनी गलती और अकेलेपन का एहसास हुआ।
Moral
अकेलेपन के राज सिंहासन से बेहतर दोस्तों के साथ का साधारण जीवन है।