एक घने जंगल के किनारे एक साफ़ पानी की नदी बहती थी। उस नदी के बीचों-बीच एक छोटा सा द्वीप था, जहाँ मीठे आमों के बहुत सारे पेड़ थे। कपी नाम का एक बंदर रोज़ उस द्वीप पर जाता और मज़े से फल खाता था। वह नदी के किनारे एक बड़ी चट्टान से छलांग लगाकर द्वीप तक पहुँचता था।
उसी नदी में एक बड़ा मगरमच्छ रहता था। उसकी नज़र काफी समय से बंदर पर थी और वह उसे खाना चाहता था। लेकिन बंदर बहुत फुर्तीला था, इसलिए मगरमच्छ उसे पकड़ नहीं पाता था। एक दिन मगरमच्छ ने एक चाल चली। उसने सोचा, 'अगर मैं एक पत्थर बन जाऊँ, तो बंदर मुझ पर कूद पड़ेगा।'
अगली सुबह, मगरमच्छ नदी के किनारे बिल्कुल एक सपाट पत्थर की तरह लेट गया। बंदर हमेशा की तरह फल खाने के लिए तैयार हुआ। लेकिन जैसे ही उसने उस 'पत्थर' को देखा, उसे कुछ अजीब लगा। वह पत्थर देखने में बहुत चिकना और नरम लग रहा था।
बंदर बहुत समझदार था। उसने सोचा, 'यह पत्थर इतना नरम क्यों है? इसमें ज़रूर कोई खतरा है।' उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई, "अरे! यह पत्थर तो बहुत अलग दिख रहा है। क्या यह सच में पत्थर है?"
मगरमच्छ ने उसे बेवकूफ बनाने के लिए कहा, "नहीं-नहीं, मैं पत्थर नहीं हूँ, मैं तो बस एक चपटा पत्थर हूँ! तुम मुझ पर कूद सकते हो!"
बंदर समझ गया कि वह जाल में फंस रहा है। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "ओह! अगर आप पत्थर हैं, तो आपको अपनी आँखें बंद करके अपना मुँह बड़ा खोलना चाहिए। तभी मैं आप पर भरोसा करके कूद पाऊँगा!"
मूर्ख मगरमच्छ बंदर की बातों में आ गया। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपना मुँह पूरा खोल दिया। उसी पल, बंदर ने फुर्ती से मगरमच्छ के सिर के ऊपर से छलांग लगाई और सुरक्षित किनारे पर पहुँच गया। अपनी मूर्खता पर पछताते हुए मगरमच्छ पानी में डूब गया।
Moral
मुसीबत के समय घबराने के बजाय बुद्धि से काम लेना चाहिए।