एक शांत गाँव में, एक माँ कुतिया अपने छह छोटे पिल्लों के साथ रहती थी। उनका घर एक पुराने और गहरे कुएँ के पास था। कुआँ बहुत खतरनाक था, इसलिए माँ हमेशा कहती थी, 'बच्चों, कभी भी कुएँ के पास मत जाना।'
पाँच पिल्ले बहुत आज्ञाकारी थे, लेकिन मनी नाम की एक नन्हीं पिल्ली बहुत जिज्ञासु थी। उसे हमेशा लगता था कि उस कुएँ के अंदर क्या छिपा है। एक दोपहर, जब बाकी पिल्ले सो रहे थे, मनी चुपके से कुएँ की ओर चल दी।
वह धीरे से कुएँ के किनारे पर पहुँची और नीचे झाँका। कुएँ के साफ़ पानी में उसे एक और पिल्ला दिखाई दिया जो उसे ही देख रहा था। मनी को लगा कि वह दूसरा पिल्ला बहुत गुस्से में है और उस पर हमला करने वाला है। डर के मारे मनी ने भी उस पर गुर्राना शुरू कर दिया और उसे डराने के लिए आगे बढ़ी।
तभी अचानक मनी का संतुलन बिगड़ गया और वह धप से कुएँ के पानी में गिर गई! पानी के अंदर जाते ही उसे समझ आया कि वह कोई दूसरा पिल्ला नहीं, बल्कि उसकी अपनी ही परछाई थी। मनी डर गई और मदद के लिए ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। उसकी आवाज़ सुनकर माँ कुतिया और बाकी भाई-बहन दौड़कर वहाँ पहुँचे। माँ ने बड़ी मुश्किल से मनी को सुरक्षित बाहर निकाला। मनी ने अपनी गलती मान ली और वादा किया कि वह अब से हमेशा बड़ों की बात मानेगी।
Moral
बड़ों की सलाह मानना ही समझदारी है।