किरण एक बहुत प्रसिद्ध वास्तुकार था। वह जहाँ भी जाता, लोग उसे घेर लेते और उसके साथ फोटो खिंचवाने लगते। एक बार ट्रेन की लंबी यात्रा के दौरान, वह एक शांत डिब्बे में बैठा था। उसके बगल में एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठे थे। उन्होंने बहुत ही साधारण कपड़े पहने थे और वे किसी सेवानिवृत्त शिक्षक की तरह लग रहे थे।
किरण को अपनी प्रसिद्धि के बारे में बात करने का मन हुआ। उसने कहा, 'नमस्ते महोदय, मैं किरण हूँ, वही वास्तुकार जिसने स्काई टॉवर बनाया है।' बुजुर्ग व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'आपसे मिलकर खुशी हुई, किरण। मैं राघवन हूँ,' और वे फिर से अपनी किताब पढ़ने लगे।
थोड़ी देर बाद, जब किरण ने उस किताब का शीर्षक देखा जिसे राघवन जी पढ़ रहे थे, तो वह दंग रह गया। वह किताब राघवन जी की जीवनी थी, जो देश के सबसे बड़े उद्योगपति थे! एक इतना शक्तिशाली व्यक्ति इतने साधारण रूप में उनके बगल में बैठा था, यह देखकर किरण हैरान रह गया।
किरण ने उस दिन सीखा कि असली महानता दिखावे में नहीं, बल्कि सादगी और विनम्रता में होती है। धन और प्रसिद्धि से बड़ा इंसान का चरित्र होता है।
Moral
सच्ची महानता सादगी और विनम्रता में निहित है, दिखावे में नहीं।