एक शांत गाँव में कार्तिक और माधव नाम के दो मित्र रहते थे। कार्तिक बहुत दयालु था, लेकिन माधव के मन में थोड़ी ईर्ष्या थी। एक बार गाँव के उत्सव के लिए कार्तिक ने लकड़ी का एक बहुत सुंदर डिब्बा बनाया। सबने उसकी कला की बहुत प्रशंसा की। यह देखकर माधव को जलन हुई।
माधव ने गाँव वालों के कान भरने शुरू कर दिए, 'कार्तिक ने यह नहीं बनाया है, वह झूठ बोल रहा है।' धीरे-धीरे लोग कार्तिक पर शक करने लगे। अगले दिन जब कार्तिक माधव से मिला, तो माधव ने एक बड़ी सी मुस्कान के साथ कहा, 'नमस्ते मित्र! कैसे हो?' कार्तिक को माधव की उस मुस्कान में सच्चाई नहीं दिखी। पीठ पीछे बुराई करना और सामने आकर मुस्कुराना कार्तिक के दिल को बहुत दुखा गया। अंत में, जब माधव की सच्चाई सामने आई, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसे बहुत पछतावा हुआ।