एक छोटे से गाँव में लियो नाम का एक लड़का रहता था। लियो बहुत ही चंचल था और उसे खेलना बहुत पसंद था, लेकिन उसे पढ़ाई और गणित से बहुत डर लगता था। उसे लगता था कि पढ़ाई की क्या ज़रूरत है?
लियो के पिता गाँव में एक छोटी सी दुकान चलाते थे। एक दिन उनके पिता ने लियो को बुलाया और कहा, "बेटा, क्या तुम इस सूची को पढ़कर बता सकते हो कि हमें कितने बोरे अनाज चाहिए?" लियो ने कागज़ देखा, लेकिन उसे अक्षर समझ नहीं आए। फिर पिता ने पूछा, "क्या तुम हिसाब लगाकर बता सकते हो कि कुल कितने पैसे हुए?" लियो अंकों को देखकर उलझन में पड़ गया। उसे लगा जैसे वह बिना आँखों के देख रहा हो।
लियो ने तय किया कि वह सीखेगा। उसने रोज़ अक्षर पढ़ना और अंक गिनना शुरू किया। धीरे-धीरे, अक्षर उसके लिए कहानियाँ बन गए और अंक उसके लिए समाधान। कुछ महीनों बाद, जब दुकान पर ग्राहक आए, तो लियो ने न केवल सामान की जानकारी पढ़ी, बल्कि हिसाब भी बिल्कुल सही लगाया। लियो को समझ आ गया कि अक्षर और अंक ही उसके जीवन की असली आँखें हैं।