पुराने समय की बात है, एक पहाड़ की तलहटी में बसे एक सुंदर गाँव में मारण नाम का एक राजकुमार रहता था। मारण बहुत दयालु था, लेकिन उसमें एक छोटी सी कमी थी। जब भी कोई उससे कुछ मांगता, वह बिना सोचे-समझे तुरंत 'हाँ' कह देता था। उसके मित्र कथिर् ने उसे चेतावनी दी थी, 'मारण, बिना सोचे निर्णय लेना एक खतरनाक आदत है। यह तुम्हें मुसीबत में डाल सकती है।' लेकिन मारण उसकी बात को हँसकर टाल देता था।
एक दिन, एक व्यापारी मारण के पास आया और बोला, 'राजकुमार, क्या मैं इस सोने के संदूक को आपके महल में सुरक्षित रख सकता हूँ?' यह जाँचने के बिना कि इसका असली मालिक कौन है, मारण ने तुरंत हाँ कह दिया। लेकिन वह व्यापारी असल में एक चोर था। कुछ दिनों बाद, असली मालिक आया और अपना संदूक माँगा। मारण चोर को पकड़ने में असमर्थ रहा और बहुत परेशान हुआ। उसकी इस एक छोटी सी आदत ने उसकी प्रतिष्ठा और महल के सम्मान को ठेस पहुँचाई।
मारण को अपनी गलती का एहसास हुआ। उस दिन से, उसने हर काम करने से पहले उसके परिणामों के बारे में गहराई से सोचना शुरू कर दिया। उसने अपनी इस छोटी सी कमी को एक बड़े दुश्मन की तरह माना और उसे सुधारने का प्रयास किया। धीरे-धीरे, वह एक बुद्धिमान और महान शासक बना।