एक सुंदर से गाँव में कथिर नाम का एक लड़का अपने पिता सोमू के साथ रहता था। सोमू एक बहुत अच्छे कुम्हार थे। एक दिन कथिर के दोस्त विनोद ने उसे एक विचार दिया। 'कथिर, हमारे पास जो भी बचत है, उससे चलो शहर में एक बहुत बड़ी दुकान खोलते हैं! हम रातों-रात अमीर बन जाएंगे!' विनोद ने उत्साह से कहा।
कथिर पहले तो बहुत खुश हुआ, लेकिन फिर उसे अपने पिता की बात याद आई। सोमू हमेशा कहते थे, 'बेटा, कोई भी काम करने से पहले तीन बातें सोचनी चाहिए: हम क्या खोएंगे? हमें क्या मिलेगा? और इन सब के बाद हमारा असली फायदा क्या होगा?' \कथिर सोचने लगा। 'अगर हम अपनी सारी बचत अभी लगा देते हैं और दुकान नहीं चली, तो हम सब कुछ खो देंगे (नुकसान)। अगर दुकान चल गई, तो हमें बहुत सारा सामान और प्रसिद्धि मिलेगी (प्राप्ति)। लेकिन, क्या मेहनत और जोखिम के बाद अंत में हमें पर्याप्त मुनाफा होगा? (अंतिम लाभ)।'
कथिर ने विनोद से कहा, 'चलो पहले थोड़ा-थोड़ा करके काम शुरू करते हैं। जब हमें अनुभव हो जाएगा, तब हम बड़ी दुकान खोलेंगे।' कथिर के इस समझदारी भरे फैसले की वजह से उन्होंने अपना पैसा भी नहीं गंवाया और धीरे-धीरे तरक्की भी की।