चंद्रपुरी के राजा विक्रम अपनी न्यायप्रियता के लिए जाने जाते थे। एक दिन, उनका भरोसेमंद जासूस अर्जुन घबराया हुआ दरबार में आया। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "महाराज, मैंने मंत्री रवि को शाही खजाने से गुप्त दस्तावेज़ चुराते देखा है। वे देश के साथ गद्दारी करने की योजना बना रहे हैं!"
राजा को गहरा धक्का लगा। रवि वर्षों से उनके सबसे करीबी सलाहकार थे। राजा का मन हुआ कि तुरंत रवि को कारागार में डाल दें। लेकिन तभी उनके मन में एक विचार आया—क्या अर्जुन सच कह रहा है? या अर्जुन का कोई अपना स्वार्थ है?
राजा ने तुरंत माया नाम की एक दूसरी चतुर जासूस को बुलाया और कहा, "माया, अर्जुन की बात की जाँच करो, लेकिन यह काम बिल्कुल गुप्त रहना चाहिए।"
माया ने कुछ दिनों तक रवि पर नज़र रखी। उसने पाया कि रवि दस्तावेज़ चुरा नहीं रहे थे, बल्कि विद्वानों की मदद के लिए उन्हें व्यवस्थित कर रहे थे। अर्जुन ने गलत समझा था। जब माया ने सच्चाई बताई, तो राजा ने राहत की साँस ली। उन्होंने रवि को सम्मान सहित मुक्त किया और अर्जुन को उसकी गलती के लिए दंडित किया। राजा समझ गए कि बिना पूरी जाँच के लिया गया निर्णय किसी निर्दोष का जीवन बर्बाद कर सकता है।