एक शांत गाँव में कार्तिक नाम का एक लड़का रहता था। उसका एक सपना था—अपने घर के पीछे एक सुंदर सब्जियों का बगीचा बनाना। एक सुबह उसने पूरे जोश के साथ निर्णय लिया, 'मैं टमाटर और फलियाँ उगाऊँगा और उनकी पूरी देखभाल करूँगा।'
शुरुआत में कार्तिक बहुत उत्साहित था। उसने मिट्टी खोदी, बीज बोए और रोज़ पानी दिया। लेकिन कुछ दिनों बाद, उसमें आलस आने लगा। जब उसे खरपतवार निकालनी होती, तो वह सोचता, 'आज बहुत गर्मी है, कल कर लूँगा।' धीरे-धीरे वह अपने काम को टालने लगा।
टालमटोल करने के कारण पौधे मुरझाने लगे। कार्तिक के पिता ने उसे समझाया, 'बेटा, जब तुम कुछ करने का निश्चय कर लेते हो, तो उसे बिना किसी हिचकिचाहट के पूरा करना चाहिए। यदि तुम बीच में रुक गए या आलस किया, तो तुम्हारा लक्ष्य हाथ से निकल जाएगा। जो काम करने की ठान ली है, उसे बिना देरी किए पूरी शक्ति से करो।'
कार्तिक को अपनी गलती समझ आ गई। अगले दिन से उसने बिना किसी बहाने के अपने बगीचे का काम समय पर करना शुरू कर दिया। कुछ ही महीनों में, उसका बगीचा लहलहाने लगा और उसे ताज़ी सब्जियाँ मिलीं। कार्तिक ने सीख लिया कि दृढ़ निश्चय के साथ किया गया काम ही सफलता दिलाता है।