बहुत समय पहले की बात है, एक हरी-भरी घाटी में 'हरित घाटी रक्षक' नाम की एक बहुत शक्तिशाली सेना थी। उस सेना में हज़ारों बहादुर और कुशल सैनिक थे। लंबे समय तक विक्रम नाम के एक बुद्धिमान और अनुभवी सेनापति ने उस सेना का नेतृत्व किया था।
एक दिन, विक्रम बीमार पड़ गए और उन्हें आराम करने की ज़रूरत पड़ी। अचानक सेना बिना किसी नेता के रह गई। सैनिकों ने मिलकर काम करने के बजाय आपस में ही झगड़ना शुरू कर दिया। 'मैं सबसे बलवान हूँ!' अर्जुन चिल्लाया। 'नहीं, मैं सबसे चतुर हूँ!' रोहन ने तर्क किया। हर सैनिक खुद को ही नेता मानने लगा और आपस में ही लड़ने लगा।
तभी दुश्मन की सेना घाटी की ओर बढ़ने लगी। सैनिक अपने हथियारों के साथ तैयार तो थे, लेकिन उनमें भारी भ्रम था। किसे आगे बढ़ना चाहिए, किसे पीछे से रक्षा करनी चाहिए और हमला कब करना चाहिए, यह कोई नहीं जानता था। क्योंकि वे एक टीम की तरह नहीं बल्कि अलग-अलग लड़ रहे थे, दुश्मन ने उन्हें आसानी से हरा दिया। सेना बहुत बड़ी थी, लेकिन एक सही नेतृत्व न होने के कारण वह हार गई।