एक शांत गाँव में आर्यन अपने पिता रवि के साथ रहता था। रवि एक बहुत ही ईमानदार व्यक्ति थे। एक बार गाँव में एक बड़ा मेला लगा। मेले में बहुत सारे खेल थे, और उन्हीं के बीच जुए के कुछ खेल भी चल रहे थे।
आर्यन के पड़ोसी विक्रम ने जुए के खेल में बहुत सारा पैसा जीत लिया। वह बहुत खुश था और सबको अपनी जीत दिखा रहा था। लेकिन उस जीत ने उसे और लालची बना दिया। वह बार-बार खेलने लगा। देखते ही देखते, उसने वह सारा पैसा हार दिया जो उसने जीता था, और यहाँ तक कि अपना घर और ज़मीन भी गँवा दी। वह बहुत दुखी होकर बैठ गया।
आर्यन ने अपने पिता से पूछा, 'पिताजी, वह तो जीत गया था, फिर वह इतना दुखी क्यों है?'
रवि ने समझाया, 'बेटा, एक मछली के बारे में सोचो। मछुआरा मछली पकड़ने के लिए कांटे पर एक चमकता हुआ दाना लगाता है। मछली को लगता है कि उसे बहुत अच्छा खाना मिला है और वह उसे तुरंत निगल लेती है। लेकिन जैसे ही वह उस दाने को निगलती है, वह नुकीला कांटा उसके गले में फंस जाता है और उसकी जान ले लेता है। जुए में जीतना भी वैसा ही है। वह जीतना सिर्फ एक चमकता हुआ दाना है, जिसके पीछे बर्बादी का कांटा छिपा है।' आर्यन समझ गया कि कुछ जीतें असल में हार होती हैं।