एक सुंदर से गाँव में कन्नन नाम का एक लड़का रहता था। उसे चित्रकारी करने का बहुत शौक था। एक बार गाँव में एक बड़ी चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की गई। विजेता को एक शानदार स्वर्ण पुरस्कार मिलने वाला था।
कन्नन ने दिन-रात मेहनत करके एक बहुत ही सुंदर चित्र बनाया। लेकिन प्रतियोगिता शुरू होने से ठीक पहले, उसका दोस्त रवि उसके पास आया। रवि ने धीरे से कहा, "कन्नन, अगर तुम इस चित्र में थोड़ा सा बदलाव कर दो, तो जज तुम्हें ही विजेता चुनेंगे। अभी जो तुमने बनाया है, उससे यह और भी बेहतर लगेगा!"
कन्नन एक पल के लिए ठिठक गया। उसके मन में द्वंद्व छिड़ गया। क्या वह जीत के लिए अपने असली काम में बदलाव कर दे? या जो उसने अपनी मेहनत से बनाया है, उसी पर अडिग रहे? उसने सोचा कि अगर उसने बदलाव किया, तो वह जीत उसकी नहीं, बल्कि एक धोखे की होगी।
कन्नन ने अपने चित्र में कोई बदलाव नहीं किया। जब परिणाम घोषित हुए, तो रवि की सलाह मानकर बनाए गए चित्र को बड़ा पुरस्कार नहीं मिला। कन्नन को स्वर्ण पदक तो नहीं मिला, लेकिन उसके चित्र की सच्चाई और सादगी की सभी ने प्रशंसा की। कन्नन को इस बात का गर्व था कि उसने अपने काम के साथ ईमानदारी बरती। उसकी इसी ईमानदारी ने उसे गाँव में सम्मान दिलाया।