पहाड़ों के पास बसे एक छोटे से गाँव में इला नाम की एक लड़की रहती थी। वह बहुत सुंदर चित्रकारी करती थी। एक बार उसे एक बड़ी चित्रकला प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिला। लेकिन जब वह चित्र बनाने बैठी, तो उसके मन में एक गहरा डर बैठ गया।
'क्या मैं यह कर पाऊँगी? क्या मुझमें इतना हुनर है?' उसके मन में ये सवाल बार-बार उठते। उसके दोस्तों और गुरु ने उसे बहुत प्रोत्साहित किया। सबने कहा कि वह जीत सकती है। लेकिन इला का अपना मन ही उसका साथ नहीं दे रहा था। दुनिया चाहे कितना भी साथ दे, उसके अंदर की आवाज़ कह रही थी, 'तुम हार जाओगी।' जब तक उसका अपना मन उसका साथ नहीं देता, उसे सब बेकार लग रहा था।
उदास होकर वह एक पेड़ के नीचे बैठ गई। तभी उसके दादाजी उसके पास आए। उन्होंने प्यार से कहा, 'इला, दूसरे लोग तुम्हारी मदद कर सकते हैं, लेकिन अगर तुम्हारा अपना मन ही तुम्हारा साथ न दे, तो पूरी दुनिया भी तुम्हारी मदद करे तो भी तुम सफल नहीं हो पाओगी। तुम्हें सबसे पहले अपना खुद का सबसे अच्छा दोस्त बनना होगा।'
उस रात इला ने खुद से बात की। उसने अपने डर को स्वीकार किया और कहा, 'घबराओ मत, हम मिलकर कोशिश करेंगे।' धीरे-धीरे उसका मन उसका दुश्मन नहीं, बल्कि दोस्त बन गया। जैसे ही उसके मन ने उसका साथ दिया, उसके हाथों ने कागज पर जादू बिखेर दिया। उसने प्रतियोगिता जीत ली। उसे समझ आ गया कि जब मन साथ दे, तो सब संभव है।