नीलगिरी नामक एक सुंदर पहाड़ी गाँव में एक बड़ा उत्सव मनाया जा रहा था। गाँव के देवता की शोभायात्रा गलियों से बहुत ही भव्य रूप में गुजर रही थी। गाँव के सभी लोग सड़कों के किनारे खड़े होकर फूल बरसा रहे थे और संगीत की थाप पर देवता का स्वागत कर रहे थे।
इस शोभायात्रा के लिए गजेंद्रन नामक एक विशाल हाथी को बहुत ही सुंदर ढंग से सजाया गया था। रंग-बिरंगे कपड़ों और सुनहरे आभूषणों से सजे गजेंद्रन को देखकर सब मंत्रमुग्ध थे। लोग तालियाँ बजा रहे थे और उत्साह दिखा रहे थे, लेकिन वे वास्तव में देवता और उस भव्य जुलूस की प्रशंसा कर रहे थे।
गजेंद्रन ने इसे गलत समझ लिया। उसे लगा कि लोग केवल उसे सम्मान देने के लिए तालियाँ बजा रहे हैं। 'सब मुझे देखकर अचंभित हो रहे हैं! मैं ही इस गाँव का सबसे महत्वपूर्ण जीव हूँ!' यह सोचकर उसका अहंकार बढ़ गया।
अपने घमंड को दिखाने के लिए, गजेंद्रन ने अपनी सूंड ऊपर उठाई और बहुत ज़ोर-ज़ोर से चिंघाड़ना शुरू कर दिया। उसकी इस आवाज़ ने उत्सव की शांति और पवित्रता को भंग कर दिया। इससे उत्सव का माहौल खराब हो गया।
यह देखकर महावत बहुत क्रोधित हो गया। उसने गजेंद्रन को डाँटते हुए कहा, 'तुम इस उत्सव की पवित्रता को खराब कर रहे हो!' उसने हाथी को नियंत्रित करने के लिए सख्त निर्देश दिए। गजेंद्रन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आया कि लोग अपनी परंपरा का सम्मान करने आए हैं, उसके अहंकार की तुष्टि के लिए नहीं। उसने शर्मिंदगी से अपना सिर झुकाया और शांति से शोभायात्रा में शामिल हो गया।
Moral
दूसरों को मिलने वाले सम्मान को अपने अहंकार का कारण न बनाएँ।