एक सुंदर से फार्म हाउस के पास एक रंग-बिरंगी मुर्गी रहती थी। उस फार्म के पास ही एक कुत्ता भी रहता था। वह कुत्ता बहुत लालची था। हर रात, जब सब सो जाते थे, वह कुत्ता चुपके से मुर्गी के दड़बे में घुस जाता और उसके अंडे चुराकर खा जाता था.
अंडों की संख्या कम होते देख मुर्गी बहुत दुखी रहने लगी। उसे समझ नहीं आता था कि उसके अंडे कौन ले जा रहा है। एक रात, उसने छिपकर देखा कि कुत्ता एक अंडा पूरा निगल रहा है। मुर्गी समझ गई कि यह शरारती कुत्ता ही चोर है।
मुर्गी ने कुत्ते को सबक सिखाने की सोची। अगली सुबह, वह पास के एक तालाब के पास गई और वहाँ से एक बड़ा, सख्त और गोल शंख का खोल ढूँढकर लाई। वह शंख देखने में बिल्कुल एक बड़े अंडे जैसा लग रहा था। मुर्गी ने उसे बड़े ध्यान से अपने दड़बे में छिपा दिया।
अगली रात, कुत्ता फिर से अंडे चुराने आया। दड़बे में एक बड़ा सा गोल आकार देखकर उसकी आँखें चमक उठीं। 'वाह! आज तो बहुत बड़ा अंडा मिला है!' कुत्ते ने सोचा। तभी अचानक मुर्गी ज़ोर से चिल्लाई, 'कुक्ड़ू-कूँ!'
डर गया कि कहीं किसान जाग न जाए, कुत्ते ने घबराहट में उस बड़े अंडे को झट से निगल लिया। लेकिन वह अंडा नहीं, बल्कि एक सख्त शंख था! वह शंख कुत्ते के गले में अटक गया और उसे बहुत तकलीफ हुई। लालच और जल्दबाजी में कुत्ते ने खुद ही मुसीबत मोल ले ली।
Moral
जल्दबाजी और लालच हमेशा नुकसान पहुँचाते हैं।