एक विशाल जंगल में कलिंघ नाम का एक बाघ रहता था। कलिंघ बहुत शक्तिशाली था, लेकिन उसे अपनी ताकत पर बहुत घमंड था और वह छोटे जानवरों के साथ बुरा व्यवहार करता था। एक दिन, जब कलिंघ भोजन कर रहा था, अचानक हड्डी का एक छोटा सा टुकड़ा उसके गले में फंस गया।
उस टुकड़े की वजह से कलिंघ को बहुत दर्द हो रहा था। वह जंगल के अन्य जानवरों जैसे बंदरों, हिरणों और खरगोशों के पास मदद के लिए गया। लेकिन कलिंघ के पुराने व्यवहार को देखकर कोई भी उसकी मदद करने को तैयार नहीं हुआ। सब डरते थे कि कहीं बाघ उनकी मदद के बदले उन्हें ही न खा जाए।
थका हुआ कलिंघ एक बड़े पेड़ के नीचे बैठ गया। तभी वहाँ एक कौआ आया। कलिंघ ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, 'कौवे भाई, कृपया मेरी मदद करो! मेरे गले में हड्डी फंस गई है। अगर तुम मुझे बचा लोगे, तो मैं तुम्हें एक बहुत बड़ा खजाना दूँगा।'
कौआ पहले तो डर गया। बाघ के मुँह के अंदर जाना बहुत खतरनाक था। लेकिन कलिंघ की आँखों में दर्द देखकर कौवे ने हिम्मत जुटाई। वह धीरे से बाघ के मुँह के पास गया और बड़ी सावधानी से अपनी चोंच से उस हड्डी के टुकड़े को बाहर निकाल दिया।
दर्द तुरंत खत्म हो गया। कलिंघ ने राहत की साँस ली। कौवे ने पूछा, 'दोस्त, तुमने जो खजाना देने का वादा किया था, वह कहाँ है?'
कलिंघ ने मुस्कुराते हुए कहा, 'दोस्त, सबसे बड़ा खजाना यह है कि जब तुम मेरे मुँह के अंदर थे, तब मैंने तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाया। मेरी कृतज्ञता ही तुम्हारा पुरस्कार है।'
कौवे को थोड़ा बुरा लगा, लेकिन एक जान बचाने की खुशी के साथ वह वहाँ से उड़ गया।
Moral
निस्वार्थ भाव से की गई मदद का संतोष ही सबसे बड़ा पुरस्कार है।