एक सुंदर पहाड़ी की तलहटी में बसे एक छोटे से गाँव में कविन नाम का एक लड़का रहता था। वह रोज़ अपनी भेड़ों को चराने पहाड़ी पर ले जाता था। कविन बहुत ही चंचल था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी—दूसरों के साथ मज़ाक करने के लिए झूठ बोलना।
एक दोपहर, जब भेड़ें घास चर रही थीं, कविन को बहुत बोरियत महसूस हुई। उसने एक शरारत करने की सोची। वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, "शेर! शेर! बचाओ! बचाओ!"
पास के खेतों में काम कर रहे ग्रामीण डर के मारे डंडे लेकर कविन की ओर दौड़े। उन्होंने घबराते हुए पूछा, "कविन, शेर कहाँ है? क्या तुम ठीक हो?"
कविन ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा और बोला, "हाहा! आप लोगों के चेहरे देखने लायक थे! यहाँ कोई शेर नहीं है, मैं तो बस मज़ाक कर रहा था!" ग्रामीण बहुत नाराज़ हुए और उन्हें डाँटकर वापस काम पर चले गए। कविन ने यह मज़ाक कई बार दोहराया, जिससे गाँव वालों का उस पर से भरोसा उठ गया।
एक शाम, जब सूरज ढल रहा था, झाड़ियों के पीछे से सचमुच एक बड़ा और भूखा शेर निकल आया। शेर को अपनी ओर आते देख कविन के होश उड़ गए। वह अपनी पूरी ताकत लगाकर चिल्लाया, "शेर! शेर! बचाओ! कोई मेरी मदद करो!"
गाँव वालों ने उसकी आवाज़ सुनी, लेकिन उन्होंने सोचा, "कविन फिर से झूठ बोल रहा है, हमें जाने की ज़रूरत नहीं है।" कोई भी उसकी मदद के लिए नहीं आया।
जब काफी देर तक कविन वापस नहीं आया, तो ग्रामीणों को चिंता हुई। वे उसे ढूँढने पहाड़ी पर गए। वहाँ उन्होंने देखा कि कविन एक पत्थर के पीछे दुबका हुआ है और शेर उसके बहुत करीब है। ग्रामीणों ने शोर मचाया और मशालें दिखाकर शेर को वहाँ से भगा दिया।
कविन रोते हुए बोला, "मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने इतनी बार झूठ बोला कि जब मुझे सच में ज़रूरत थी, तो किसी ने मुझ पर विश्वास नहीं किया। मुझे बचाने के लिए धन्यवाद।" उस दिन के बाद कविन ने कभी झूठ नहीं बोला।
Moral
झूठ बोलने वाले पर कोई विश्वास नहीं करता, चाहे वह सच ही क्यों न बोल रहा हो।