प्रोफेसर आर्यन एक बहुत ही ज्ञानी दर्शनशास्त्र (Philosophy) के शिक्षक थे। वे अपने छात्रों को केवल किताबी ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि उन्हें सोचने का एक नया नज़रिया देते थे।
एक दिन उन्होंने कक्षा में एक अनोखी प्रतियोगिता की घोषणा की। उन्होंने कहा, "आज जो छात्र इस चुनौती को सबसे बेहतर तरीके से पूरा करेगा, उसे सबसे अधिक अंक मिलेंगे। चुनौती यह है कि आपको यह साबित करना है कि इस कमरे में रखी एक वस्तु इस कमरे में मौजूद नहीं है।"
छात्र हैरान रह गए। प्रोफेसर ने अपनी कुर्सी उठाई और उसे मेज के ऊपर रख दिया। उन्होंने इशारा करते हुए कहा, "यह कुर्सी इस कमरे में नहीं है। अपने तर्क या बुद्धि से इसे साबित करो।"
पूरी कक्षा में चर्चा शुरू हो गई। कुछ छात्र बहुत लंबे और कठिन निबंध लिखने लगे। उन्होंने लिखा कि 'कुर्सी' केवल एक विचार है, एक भौतिक वस्तु नहीं। रोहन नाम के एक छात्र ने बहुत ही दार्शनिक भाषा में लिखा कि कुर्सी का अस्तित्व केवल हमारे मस्तिष्क में है, इसलिए वह कमरे में नहीं है।
लेकिन लियो नाम के एक छात्र ने बहुत ही छोटा और सीधा उत्तर लिखा: "यह कुर्सी इस कमरे में नहीं है, क्योंकि यह मेज के ऊपर रखी है, और कुर्सी का सही स्थान फर्श पर होता है!"
प्रोफेसर आर्यन लियो का जवाब पढ़कर मुस्कुरा दिए। जहाँ बाकी छात्र कठिन शब्दों और उलझे हुए विचारों में खो गए थे, वहीं लियो ने सामने दिख रही सादी और सच्ची बात को पकड़ लिया। छात्रों ने सीखा कि असली बुद्धिमानी जटिलता में नहीं, बल्कि सादगी और सच्चाई को देखने में है।
Moral
सच्ची बुद्धिमानी जटिल विचारों में नहीं, बल्कि सरल सत्य को देखने में है।