बहुत समय पहले की बात है, एक न्यायप्रिय राजा एक विशाल राज्य पर शासन करता था। वह मानता था कि मजबूरी में की गई गलतियों को सुधारा जा सकता है, लेकिन जो लोग केवल मनोरंजन के लिए दूसरों को परेशान करते हैं, उन्हें माफ नहीं किया जाना चाहिए। एक दिन, तीन अपराधियों को दरबार में पेश किया गया।
पहला व्यक्ति एक चोर था, जिसने भूख मिटाने के लिए अमीरों का सामान चुराया था। राजा ने दया दिखाते हुए कहा, "उसने पेट भरने के लिए चोरी की है, उसे महल में काम देकर जीविका कमाने का मौका दें।"
दूसरी एक महिला थी, जिसने जादूगरनी होने का ढोंग करके लोगों को ठगा था। राजा ने उसे भी सुधारने का मौका देते हुए महल के बगीचे में काम करने का आदेश दिया।
तीसरा व्यक्ति कवि नाम का एक युवक था। कवि न तो चोरी करता था और न ही किसी को शारीरिक चोट पहुँचाता था। लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी—वह केवल लोगों को चिढ़ाने और झूठ बोलकर उनका मानसिक सुकून छीनने के लिए शरारतें करता था। राजा ने क्रोधित होकर कहा, "तुम दूसरों की शांति छीनते हो, और यह एक बड़ा अपराध है। तुम्हें दंड दिया जाएगा!"
जैसे ही सजा सुनाई गई, एक चमत्कार हुआ! कवि का कटा हुआ सिर हंसने लगा। वह बोला, "मुझे राजा के पास ले चलो, मुझे उन्हें प्रणाम करना है!" डरे हुए सैनिकों ने राजा को बताया। जब एक अधिकारी देखने गया, तो सिर शांत था, लेकिन जैसे ही अधिकारी मुड़ा, सिर फिर से हंसने लगा और सैनिकों का मज़ाक उड़ाने लगा।
इस अफरा-तफरी में एक निर्दोष सैनिक को सजा मिल गई। यह देखकर सिर और ज़ोर से हँसा, "देखा! मेरी शरारत ने तुम्हारी ज़िंदगी भी उलट-पुलट कर दी!"
राजा ने दुखी होकर उस सिर को ज़मीन में गहरा दफ़नाने का आदेश दिया। कुछ समय बाद, उसी जगह पर एक अजीब पेड़ उगा। जब भी कोई उस पेड़ के फल को हिलाता, तो अंदर से एक 'ठक-ठक' की आवाज़ आती, जो उस शरारती सिर की हँसी जैसी लगती थी। तभी से लोग उस फल को शरारती सिर की याद में देखते हैं।