बहुत समय पहले चंद्रपुर नाम का एक समृद्ध राज्य था। वहाँ विक्रम नाम का एक राजा राज करता था। राजा बहुत दयालु था, लेकिन उसकी एक बड़ी कमी थी—उसे पढ़ना-लिखना नहीं आता था। बचपन में पढ़ाई से जी चुराने के कारण, वह एक अज्ञानी राजा बन गया था।
राजा की इस कमजोरी का फायदा उठाने के लिए कई कवि उसके दरबार में आने लगे। वे राजा की झूठी प्रशंसा करते और उसकी बहादुरी के बढ़ा-चढ़ाकर किस्से सुनाते। राजा उनकी बातों में आकर इतना खुश होता कि उसने घोषणा कर दी, "जो भी कवि मेरे दरबार में कविता लेकर आएगा, उसे मैं कविता की पांडुलिपि के वजन के बराबर सोना दूंगा।"
धीरे-धीरे कवि तो बहुत बढ़ गए, लेकिन राजा का खजाना खाली होने लगा। राजा के बुद्धिमान मंत्री ने देखा कि राजा की अज्ञानता राज्य को संकट में डाल रही है।
एक दिन मंत्री ने राजा से कहा, "महाराज, मैंने आपकी महानता पर एक बहुत ही सुंदर महाकाव्य लिखा है। मैं आज इसे आपको भेंट करना चाहता हूँ।"
राजा गर्व से बोला, "यह तो बहुत अच्छी बात है! लाओ उसे यहाँ, और तुम्हें कविता के वजन के बराबर सोना मिलेगा!"
मंत्री ने मुस्कुराते हुए कहा, "महाराज, मैंने वह कविता कागज़ पर नहीं लिखी है। आपकी महिमा इतनी महान है कि मैंने उसे महल के बगीचे में स्थित एक विशाल पत्थर पर उकेरा है।"
राजा उत्सुकता से मंत्री के साथ बगीचे में गया। वहाँ एक बहुत बड़ा और भारी पत्थर था, जिस पर सुंदर कविताएँ खुदी हुई थीं। मंत्री ने कहा, "महाराज, जैसा कि आपने वादा किया था, क्या अब मैं इस पत्थर के वजन के बराबर सोना प्राप्त कर सकता हूँ?"
राजा उस विशाल पत्थर को देखता रह गया। उसे समझ आ गया कि अगर वह अपना वादा पूरा करना चाहता है, तो उसे राज्य का सारा धन देना पड़ेगा और फिर भी वह कम पड़ेगा। उस पल उसे अपनी अज्ञानता का अहसास हुआ। उसे समझ आया कि बिना शिक्षा के लिया गया निर्णय कितना भारी पड़ सकता है।
राजा ने अपनी गलती मानी और विद्वानों से शिक्षा लेने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे वह एक बुद्धिमान और न्यायप्रिय राजा बना।