एक समृद्ध राज्य में कवि नाम का एक कुशल धनुर्धर रहता था। कवि बहुत प्रतिभाशाली था, लेकिन उसमें एक बड़ी कमी थी—वह केवल उसी पक्ष का साथ देता था जो जीत रहा हो। उसका मानना था कि केवल विजेता के साथ रहकर ही सम्मान पाया जा सकता है।
एक दिन, ज्ञानी ऋषि अरुणा उसकी मुलाकात उनसे हुए। कवि की सटीकता को परखने के लिए, अरुणा ने एक पेड़ की ओर इशारा किया। "कवि, क्या तुम अपने तीर से पेड़ की पत्तियों को छूते हुए, मेरे पैरों के नीचे छिपी एक छोटी सी पत्ती को भी छू सकते हो?" अरुणा ने पूछा।
कवि ने आत्मविश्वास से धनुष उठाया और तीर छोड़ा। तीर ने पेड़ की टहनियों को छूते हुए बड़ी कुशलता से अरुणा के पैरों के पास पड़ी पत्ती को भी स्पर्श किया। अरुणा उसकी कला देखकर दंग रह गए।
तभी अरुणा ने पूछा, "कवि, यदि कल कोई बड़ा युद्ध हो, तो तुम किस सेना का साथ दोगे?"
कवि ने बिना सोचे कहा, "मैं उसी सेना के साथ रहूँगा जो युद्ध जीत रही होगी। हारने वालों के साथ रहने में मेरा कोई हित नहीं है।"
अरुणा के चेहरे पर एक गहरी चिंता आ गई। उन्होंने कहा, "कवि, तुम उस पक्षी की तरह हो जो केवल उसी पेड़ पर बैठता है जो हिल नहीं रहा हो। तुम केवल जीत की स्थिरता चाहते हो, लेकिन तुम्हारे पास वफादारी नहीं है। जो व्यक्ति केवल सफलता के पीछे भागता है, वह कभी किसी का सच्चा मित्र नहीं बन पाता। जो व्यक्ति परिस्थितियों के साथ अपना पक्ष बदलता है, वह समाज में अपना सम्मान खो देता है।"
कवि को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझ लिया कि असली महानता जीत में नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों पर टिके रहने में है।
Moral
वफादारी जीत से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है; जो केवल अवसरवादी होते हैं, वे सम्मान खो देते हैं।