पहाड़ों के पास बसे एक छोटे से गाँव में आदि और नीला नाम के दो भाई-बहन रहते थे। ईस्टर का समय था, और गाँव के सभी बच्चे बगीचों में छिपे हुए रंगीन अंडों को खोजने के खेल में मग्न थे।
आदि को एक जिज्ञासा हुई। उसने अपनी बहन से पूछा, "नीला, हम ये अंडे क्यों ढूँढ रहे हैं? इस खेल का असली मतलब क्या है?" नीला मुस्कुराई और बोली, "तुम खुद ही पता लगाओगे, आदि! बस ढूँढते रहो!"
तभी झाड़ियों के पीछे से एक मुर्गी 'कुकड़ूँ-कूँ' करती हुई बाहर निकली। वहाँ कुछ सफेद अंडे पड़े थे। नीला ने सावधानी से उन्हें अपनी टोकरी में इकट्ठा कर लिया।
उस शाम, आदि बहुत धूल और मिट्टी में सना हुआ घर आया। उसके पिता थोड़े नाराज हुए। "आदि! तुम इतने गंदे क्यों हो? अगर तुम बाहर खेलकर आए और हाथ-पैर नहीं धोए, तो बीमारियाँ घर आ जाएँगी!" उन्होंने चेतावनी दी।
अगली सुबह जब आदि उठा, तो वह अपने घर में नहीं बल्कि अपने मामा की मिठाई की दुकान के एक कमरे में था। नीला को तेज़ बुखार हो गया था, और उसे सुरक्षित रखने के लिए उसके माता-पिता उसे मामा के घर ले आए थे।
आदि को बहुत दुख हुआ। उसने मामा की दुकान में छोटे-मोटे काम करना शुरू कर दिया—मिठाइयाँ सजाना और सफाई करना। मामा और मामी उसे बहुत प्यार से देख रहे थे, लेकिन आदि का मन बस नीला के बारे में सोच रहा था।
एक दिन बगीचे में खेलते समय, आदि ने एक पेड़ पर चिड़िया का घोंसला देखा। अचानक, दो बड़े बाज उस घोंसले पर हमला करने के लिए नीचे आए। नन्हे पक्षी डर के मारे चहचहाने लगे। आदि ने तुरंत एक छोटा पत्थर उठाया और बाजों की ओर फेंका। डरकर बाज वहाँ से भाग गए।
जब आदि घर पहुँचा, तो उसकी मामी ने देखा कि वह फिर से मिट्टी में सना हुआ है। आदि ने उन्हें बताया कि कैसे उसने घोंसले को बचाया। उसने यह भी बताया कि बाज अंडों को खाने के लिए आए थे। यह सुनकर मामी ने मुस्कुराकर आदि की तारीफ की।
नीला धीरे-धीरे ठीक होने लगी। इस दौरान आदि ने स्वच्छता का महत्व सीखा। उसने हमेशा बाहर से खेलकर आने के बाद हाथ-पैर धोने की आदत डाल ली। बाद में, जब वे चर्च गए, तो पादरी ने एक कहानी सुनाई कि कैसे एक अंडे से नया जीवन बाहर आता है।
तब आदि को समझ आया कि अंडा केवल एक खेल का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक नई शुरुआत का प्रतीक है। जैसे नीला बीमारी से ठीक होकर एक नई शुरुआत कर रही थी, वैसे ही अंडा भी नई ज़िंदगी का संकेत है।