नीले समुद्र की गहराइयों में, मूंगे की चट्टानों के बीच बसे एक सुंदर साम्राज्य में मरीना नाम की एक छोटी जलपरी रहती थी। एक दिन उसकी दादी ने उसे समझाया, "मरीना, अब तुम बड़ी हो गई हो। समुद्र के ऊपर इंसानों की दुनिया है। उनके पास हमारी तरह पूंछ नहीं होती और वे पानी में ज़्यादा देर नहीं रह सकते।"
मरीना बहुत उत्साहित थी। वह समुद्र की सतह पर एक चट्टान पर बैठी थी, तभी उसने एक राजकुमार का जहाज देखा। उसे देखते ही मरीना के मन में उसके प्रति लगाव हो गया। अचानक, मौसम बिगड़ गया और एक भयानक तूफान आ गया। जहाज लहरों से टकराने लगा और डूबने लगा। मरीना ने बिना सोचे-समझे पानी में छलांग लगा दी और डूबते हुए राजकुमार को बचाकर किनारे तक ले आई।
तभी एक दूसरी राजकुमारी का जहाज वहां आया। राजकुमारी ने राजकुमार को देखा और उसे अपने जहाज पर ले गई। मरीना यह देखकर बहुत दुखी हुई। तभी एक समुद्री परी वहां आई और बोली, "मरीना, अगर तुम इंसान बनना चाहती हो, तो यह जादुई पानी पी लो।" मरीना ने वह पानी पी लिया और उसके पूंछ की जगह पैर आ गए।
जब मरीना किनारे पहुंची, तो उसने देखा कि राजकुमार और राजकुमारी की शादी हो रही है। मरीना को बहुत बुरा लगा। उसकी बहनों ने उसे समझाया, "मरीना, तुमने उसे निस्वार्थ भाव से बचाया था। उसका सुख देखकर दुखी मत हो।"
मरीना को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने देखा कि इंसान भी अच्छे होते हैं। उसने अपना दुख भुला दिया और वापस अपने समुद्र के घर लौट गई। उसके पिता, समुद्र के राजा ने उसकी बहादुरी और त्याग की प्रशंसा की और उसे फिर से एक सुंदर जलपरी बना दिया।
Moral
निस्वार्थ भाव से की गई मदद कभी बेकार नहीं जाती।