बहुत समय पहले सोमनाथ नाम का एक बड़ा व्यापारी रहता था। उसका एक भरोसेमंद सहायक था, जिस पर वह बहुत विश्वास करता था। लेकिन एक दिन उस सहायक ने सोमनाथ के सोने के सिक्कों से भरी थैली चुरा ली और गायब हो गया। सोमनाथ ने उसे बहुत ढूंढा, पर वह कहीं नहीं मिला।
कुछ हफ्तों बाद, जब सोमनाथ एक बाज़ार में खरीदारी कर रहा था, उसने रघु नाम के एक व्यक्ति को देखा। सोमनाथ को तुरंत यकीन हो गया कि यही वह चोर है जिसने उसके पैसे चुराए थे। रघु बहुत चालाक था, इसलिए सोमनाथ थोड़ा डर गया कि कहीं वह उसे पहचान न ले।
अचानक, रघु दौड़कर सोमनाथ के पास आया और सबके सामने चिल्लाने लगा, "श्रीमान! यह आदमी आपका सहायक होने का नाटक कर रहा है, लेकिन असल में यही वह चोर है जिसने आपके पैसे चुराए हैं!" रघु ने झूठ बोला। सोमनाथ दंग रह गया। "तुम खुद चोर हो, मुझ पर इल्जाम क्यों लगा रहे हो?" सोमनाथ ने चिल्लाकर कहा। शोर सुनकर गाँव के चतुर न्यायाधीश वहाँ आ पहुँचे।
न्यायाधीश ने दोनों की बातें सुनीं। रघु बहुत सफाई से झूठ बोल रहा था। न्यायाधीश समझ गए कि केवल बातों से सच का पता नहीं चलेगा। उन्होंने एक योजना बनाई।
उन्होंने दोनों को एक छोटी खिड़की के पास बुलाया। खिड़की के बाहर एक पहरेदार तेज़ तलवार लेकर खड़ा था। न्यायाधीश ने गंभीर होकर कहा, "तुम दोनों को अपने सिर इस खिड़की से बाहर निकालने होंगे। जो भी झूठ बोलेगा या संदिग्ध लगेगा, पहरेदार उसका सिर तुरंत काट देगा!"
रघु डर के मारे कांपने लगा। तलवार के नाम से ही वह घबरा गया और तुरंत अपना सिर खिड़की से अंदर खींच लिया। लेकिन सोमनाथ को पता था कि वह निर्दोष है, इसलिए उसने बिना किसी डर के अपना सिर शांति से खिड़की से बाहर निकाल दिया।
न्यायाधीश मुस्कुराए और बोले, "चोर का डर ही उसकी सच्चाई बता गया!" रघु की चालाकी पकड़ में आ गई और न्यायाधीश ने उसे पकड़कर जेल भेज दिया। सोमनाथ को उसके खोए हुए पैसे वापस मिल गए।
Moral
झूठ कितना भी चतुर क्यों न हो, डर हमेशा सच को सामने ले आता है।