एक घने जंगल में सोमू नाम का एक लोमड़ी रहता था। सोमू बहुत आलसी था। जब दूसरे लोमड़ी मेहनत करके शिकार करते, तो सोमू चुपके से उनका खाना चुरा लेता था। इससे बाकी लोमड़ियाँ बहुत नाराज़ हो गईं। उन्होंने तय किया, 'एक टोली शिकार करेगी और दूसरी टोली सोमू को भगाएगी!'
जब सोमू को खाना मिलना बंद हो गया, तो वह भूख से व्याकुल होकर खाने की तलाश में जंगल के एक अनजान हिस्से में निकल गया। वहाँ उसे एक पुराना, खंडहर हो चुका किला दिखाई दिया। अचानक, वहाँ से एक डरावनी आवाज़ आई। 'धम! धम!' ऐसा लगा जैसे कोई बड़ा जानवर वहाँ छिपा हो।
सोमू डर के मारे कांपने लगा। वह भागने ही वाला था कि तभी उसके मन में एक विचार आया, 'अगर मैं हर आवाज़ से डरकर भागता रहा, तो मैं कभी अपनी भूख नहीं मिटा पाऊंगा। मुझे देखना ही होगा कि वह आवाज़ क्या है।'
कांपते हुए कदमों से वह आवाज़ की ओर बढ़ा। वहाँ जाकर देखा तो पता चला कि तेज़ हवा के कारण एक पुराना लोहे का बर्तन और मिट्टी का घड़ा लुढ़क रहे थे। वहाँ कोई राक्षस नहीं था।
उसी बर्तन के पास उसे खाने का एक बड़ा ढेर मिला—सूखा मांस और मीठे फल। वह खाना सोमू के कई दिनों के लिए काफी था। सोमू ने सोचा, 'अगर मैं डरकर भाग जाता, तो यह स्वादिष्ट खाना मुझे कभी नहीं मिलता।' उस दिन से सोमू ने आलस छोड़ दिया और बहादुर बनने का फैसला किया।
Moral
साहस ही डर के पीछे छिपे अवसरों को खोलता है।