एक बढ़ते हुए शहर के पास एक निर्माण स्थल पर, मजदूर कड़ी धूप में काम कर रहे थे। उन्हें एक बहुत भारी पत्थर को रास्ते से हटाना था। मजदूर बहुत कोशिश कर रहे थे, लेकिन पत्थर टस से मस नहीं हो रहा था। वे थक चुके थे और पसीने से तर-बतर थे।
वहाँ मौजूद सुपरवाइजर उनकी मदद करने के बजाय उन पर चिल्ला रहा था। "इतनी धीमी गति क्यों? तुम सब बहुत आलसी हो!" वह गुस्से में चिल्लाया। उसे यह नहीं पता था कि अगर वह थोड़ा सा हाथ बटा देता, तो काम बहुत जल्दी हो जाता।
तभी एक घुड़सवार वहाँ से गुजरा। मजदूरों की हालत देखकर वह घोड़े से उतर गया। उसने सुपरवाइजर से शांति से कहा, "श्रीमान, ये लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं। चिल्लाने के बजाय अगर आप थोड़ा सहयोग दें, तो काम आसान हो जाएगा।"
सुपरवाइजर को गुस्सा आ गया। उसने कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे सिखाने की? मैं एक बड़ा अधिकारी हूँ, तुम्हारी तरह मजदूर नहीं!"
उस व्यक्ति ने बहस नहीं की। वह मजदूरों के पास गया और बोला, "चलो, हम सब मिलकर इसे धक्का देते हैं।" उसकी ताकत और सही दिशा के साथ, वह भारी पत्थर अपनी जगह से खिसक गया। मजदूर खुशी से झूम उठे।
जब वह व्यक्ति अपने घोड़े पर बैठने लगा, तो सुपरवाइजर ने उत्सुकता से पूछा, "तुम आखिर हो कौन?"
उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं इस प्रांत का सेनापति विक्रम हूँ।"
यह सुनकर सुपरवाइजर का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने तुरंत माफी मांगी। उसे समझ आ गया कि असली नेता वह नहीं जो आदेश दे, बल्कि वह है जो ज़रूरत पड़ने पर साथ खड़ा हो।
Moral
सच्चा नेतृत्व दूसरों पर हुक्म चलाने में नहीं, बल्कि उनकी मदद करने में है।