एक समय की बात है, एक बहुत बड़ी साइकिल बनाने वाली कंपनी थी। उसके मालिक श्री अमन बहुत ही सरल और विनम्र स्वभाव के व्यक्ति थे। उनकी बनाई साइकिलें अपनी मजबूती के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती थीं।
एक बार अमन जी एक दूसरे शहर के उत्सव में शामिल होने गए। वहाँ उन्होंने देखा कि लोग हैरान थे क्योंकि अमन जी अपनी कंपनी की साइकिल के बजाय किसी दूसरी कंपनी की महंगी साइकिल का उपयोग कर रहे थे। लोग आपस में चर्चा करने लगे, "इतनी बड़ी कंपनी के मालिक अपनी ही साइकिल क्यों नहीं चलाते?"
एक शाम एक बड़े भोज के दौरान, एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, "अमन जी, आपकी साइकिलें तो सबसे बेहतरीन हैं, फिर आप यह दूसरी साइकिल क्यों चला रहे हैं?"
अमन जी मुस्कुराए और बोले, "दरअसल, मैंने अपने मैनेजर से अपनी एक साइकिल तैयार करने को कहा था। लेकिन मेरे मैनेजर बहुत ही ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति हैं। उनका एक ही नियम है—ग्राहक की संतुष्टि सबसे पहले।
वे मानते हैं कि फैक्ट्री से निकलने वाली हर साइकिल पहले उन ग्राहकों के पास जानी चाहिए जिन्होंने उसका ऑर्डर दिया है। मैं मालिक हूँ, फिर भी वे ग्राहकों के ऑर्डर को मुझसे ऊपर रखते हैं। इसलिए, मैं अपनी साइकिल के लिए इंतज़ार कर रहा हूँ।"
अमन जी की इस बात और उनके मैनेजर की ईमानदारी को सुनकर सभी लोग दंग रह गए। उन्होंने सीखा कि असली सफलता केवल उत्पाद में नहीं, बल्कि ईमानदारी में भी है।
Moral
ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा ही किसी भी व्यक्ति की असली पहचान है।