एक बहुत ही सुंदर नगर में एक मूर्तिकार रहता था। वह बहुत ही ईमानदार और मेहनती था। एक बार नगर के चुनाव में वह प्रधान बनने के लिए खड़ा हुआ। उसका मुकाबला एक बहुत ही धनी और प्रभावशाली व्यक्ति से था, जिसे दूसरों का मज़ाक उड़ाना बहुत पसंद था।
चुनाव के दिन, जब हज़ारों लोग सभा में इकट्ठा हुए, तो उस धनी व्यक्ति ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "क्या आप जानते हैं यह मूर्तिकार कौन है? यह तो एक मामूली पुस्तकालय में किताबें रखने वाला कर्मचारी था। भला एक मामूली कर्मचारी इतने बड़े नगर का नेतृत्व कैसे कर सकता है?"
सभा में सन्नाटा छा गया। मूर्तिकार को थोड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई, लेकिन उसने अपना आपा नहीं खोया। उसने एक शांत मुस्कान के साथ भीड़ की ओर देखा और फिर उस व्यक्ति से कहा, "मित्र, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। मैं उस पुस्तकालय में काम करता था। और मुझे अच्छी तरह याद है, आप उस समय किताबें पहुँचाने वाले गाड़ी चलाने वाले थे। आप किताबें लाते थे और मैं उन्हें करीने से सजाता था। पुराने दिनों को इतने प्यार से याद करने के लिए आपका धन्यवाद!"
यह सुनकर पूरी सभा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी। विरोधी की कोशिश मूर्तिकार को नीचा दिखाने की थी, लेकिन मूर्तिकार की विनम्रता ने सबका दिल जीत लिया। अंत में, लोगों ने मूर्तिकार को ही अपना नेता चुन लिया।
Moral
विनम्रता और समझदारी से किसी भी अपमान का सामना किया जा सकता है।