पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में एक सुंदर स्कूल था। वहाँ आनंद नाम के एक शिक्षक पढ़ाते थे। आनंद केवल किताबी ज्ञान ही नहीं देते थे, बल्कि वे अपने छात्रों को अनुशासन और स्वच्छता का महत्व भी सिखाते थे।
एक सुबह जब आनंद अपनी कक्षा की ओर जा रहे थे, उन्होंने देखा कि स्कूल के दरवाज़े के पास बहुत सारा कूड़ा, फटे कागज़ और पुराने कपड़े बिखरे पड़े हैं। वह जगह बहुत गंदी लग रही थी। उन्होंने किसी को बुलाने के बजाय, खुद ही झुककर सारा कूड़ा इकट्ठा किया और अपने बैग में रख लिया।
कक्षा में पढ़ाई पूरी होने के बाद, उन्होंने अपने बैग से वह सारा कूड़ा निकालकर मेज पर रख दिया। बच्चे यह देखकर हैरान रह गए। एक छात्र ने धीरे से पूछा, 'सर, आप यह कचरा कक्षा के अंदर क्यों लाए?'
आनंद जी ने मुस्कुराते हुए कहा, 'बच्चों, यह कचरा बाहर बिखरा हुआ था और हमारे स्कूल को गंदा कर रहा था। स्कूल ज्ञान का मंदिर है। यदि हमारा परिवेश गंदा होगा, तो हमारा मन भी एकाग्र नहीं हो पाएगा। इस जगह को साफ रखना सिर्फ मेरा काम नहीं है, बल्कि आप सभी का कर्तव्य है।'
अपने शिक्षक को खुद सफाई करते देख बच्चों को अपनी लापरवाही पर बहुत शर्म महसूस हुई। उस दिन के बाद, स्कूल के हर बच्चे ने अपने स्कूल और कक्षा को साफ रखने का संकल्प लिया।
Moral
स्वच्छता बनाए रखना हम सभी का कर्तव्य है।