पहाड़ों के पास बसे एक छोटे से गाँव में कविन नाम का एक लड़का रहता था। उसका सपना था कि वह एक महान योद्धा बने। वह हमेशा बहादुर योद्धाओं की कहानियाँ सुनता और उनके जैसा बनना चाहता था।
एक दिन उसे पता चला कि प्रसिद्ध युद्ध कला के गुरु वीरमणी पास के आश्रम में आए हैं। कविन दौड़कर उनके पास गया और बोला, "गुरुदेव, कृपया मुझे तलवारबाजी सिखाएं! मैं भी एक महान योद्धा बनना चाहता हूँ।"
गुरु वीरमणी ने उसकी ओर देखा और कहा, "मैं तुम्हें सिखाऊँगा, लेकिन तुम्हें मेरे आश्रम में रहकर मेरे दैनिक कार्यों में मेरी सहायता करनी होगी।"
कविन खुशी-खुशी मान गया। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, कविन निराश होने लगा। तलवार चलाने के बजाय, उसे पानी भरना, लकड़ियाँ काटना और आश्रम की सफाई करने जैसे काम करने पड़ते थे। इतना ही नहीं, जब भी कविन काम में व्यस्त होता, गुरु अचानक लकड़ी के डंडे से उस पर वार करते। कविन बहुत उलझन में था। उसे लगता था कि उसे योद्धा बनाने के बजाय नौकर बनाया जा रहा है।
महीनों बीत गए और कविन का शरीर काफी मजबूत और फुर्तीला हो गया था। एक दिन जब गुरु ध्यान में लीन थे, कविन ने पास पड़ी एक लकड़ी की तलवार उठाई और अचानक गुरु की ओर कर दी। गुरु ने तुरंत अपनी आँखें खोलीं और बड़ी कुशलता से खुद को बचा लिया।
कविन डर के मारे कांपने लगा। "गुरुदेव, मुझे क्षमा करें! मेरा इरादा आपका अपमान करने का नहीं था," उसने रोते हुए कहा।
गुरु मुस्कुराए और बोले, "कविन, तलवार चलाना तो कोई भी सीख सकता है। लेकिन एक सच्चा योद्धा वही है जो बिना देखे आने वाले खतरे को भांप ले। इन कामों के जरिए मैंने तुम्हें सतर्क रहना सिखाया। काम करते समय तुम्हारी इंद्रियां और ध्यान हमेशा जागृत रहते थे। यही तुम्हारी पहली असली परीक्षा थी।"
कविन को समझ आ गया कि गुरु उसे केवल काम नहीं करवा रहे थे, बल्कि उसकी एकाग्रता और सजगता बढ़ा रहे थे। इसके बाद उसने पूरी लगन से अभ्यास किया और एक महान योद्धा बना।
Moral
सजगता और अनुशासन ही महानता की नींव हैं।