कविन एक साहसी पर्वतारोही था। एक बार वह एक बहुत ऊँचे और बर्फीले पहाड़ पर चढ़ रहा था। चारों तरफ घना कोहरा और बर्फ गिर रही थी।
अचानक एक हिमस्खलन हुआ और कविन का पैर फिसल गया। वह नीचे गिरने लगा, लेकिन तभी उसकी सुरक्षा रस्सी एक चट्टान में फंस गई और वह हवा में लटक गया। घना कोहरा इतना था कि उसे पता ही नहीं चल रहा था कि वह कितनी ऊंचाई पर है। उसे लगा कि वह मौत के मुँह में लटका है।
डर के मारे वह चिल्लाया, "हे भगवान! कृपया मेरी रक्षा करें!"
तभी उसे अपने मन में एक शांत आवाज़ सुनाई दी। "डरो मत कविन, मैं तुम्हारे साथ हूँ। अगर तुम सुरक्षित रहना चाहते हो, तो उस रस्सी को काट दो जो तुम्हें थामे हुए है। वही नीचे उतरने का सही रास्ता है।"
कविन घबरा गया। उसने सोचा, "अगर मैंने रस्सी काट दी, तो मैं सीधे नीचे गिरकर मर जाऊँगा!" डर के कारण उसने रस्सी नहीं काटी और घंटों वहीं लटका रहा।
अगली सुबह जब बचाव दल वहाँ पहुँचा, तो वे दंग रह गए। कोहरा छंटने पर पता चला कि कविन किसी गहरी खाई में नहीं, बल्कि ज़मीन से मात्र दो फीट ऊपर एक छोटी झाड़ी के ऊपर लटका हुआ था। अगर उसने रस्सी काट दी होती, तो वह सुरक्षित ज़मीन पर होता।
कविन को समझ आया कि डर के कारण वह सच्चाई नहीं देख पाया। सही समय पर सही निर्णय लेना ही असली साहस है।
Moral
सच्चा विश्वास वह है जो डर के समय भी सही निर्णय लेने का साहस दे।