एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। एक दिन खेलते समय, अर्जुन को झाड़ियों के पास एक बटुआ मिला। जब उसने उसे खोला, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं—उसमें सोने के बहुत सारे सिक्के थे! अर्जुन ने सोचा, 'अगर मैं इसे रख लूँ, तो मैं ढेर सारे खिलौने और मिठाइयाँ खरीद सकता हूँ!'
जैसे ही वह भागने लगा, उसके पिता ने उसे देख लिया। उसके पिता एक बहुत ही ईमानदार व्यक्ति थे। उन्होंने अर्जुन को पास बुलाया और समझाया, 'बेटा, दूसरों की चीज़ को बिना पूछे लेना गलत है। गलत तरीके से मिली खुशी केवल एक पल के लिए होती है, लेकिन वह मन को शांति नहीं देती और न ही समाज में सम्मान दिलाती है। असली खुशी वही है जो ईमानदारी से मिले।'
अर्जुन को अपने पिता की बात समझ आ गई। उसने वह बटुआ उस व्यक्ति को लौटा दिया जिसका वह था। जब उस व्यक्ति ने अर्जुन को धन्यवाद दिया, तो अर्जुन को अपने दिल में एक अद्भुत शांति महसूस हुई। उसे समझ आ गया कि गलत रास्ते से मिलने वाला सुख केवल एक भ्रम है, जबकि सच्चाई से मिलने वाला संतोष ही असली खुशी है।