एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का और उसके पिता रवि रहते थे। रवि एक मेहनती व्यक्ति थे, लेकिन उनका सपना था कि उनका बेटा बड़ा होकर विद्वानों के बीच सम्मान पाए। एक साल रवि ने कुछ अतिरिक्त पैसे कमाए। उन्होंने सोचा कि वे अर्जुन के लिए एक बड़ा घर या महंगे खिलौने खरीद सकते हैं, लेकिन फिर उन्होंने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने उन पैसों को अर्जुन की शिक्षा और किताबों पर खर्च करने का फैसला किया।
कई साल बीत गए। गाँव में विद्वानों और बुद्धिजीवियों की एक बड़ी सभा आयोजित की गई। अर्जुन अब एक युवा बन चुका था। जब सभा में गंभीर चर्चाएँ हो रही थीं, तब अर्जुन ने अपनी बात रखी। उसके विचार इतने गहरे और समझदारी भरे थे कि पूरी सभा मंत्रमुग्ध हो गई। सभा में मौजूद बुजुर्गों ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, 'यह बालक तो वास्तव में ज्ञानी है!' रवि ने दूर से यह सब देखा और उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अर्जुन को धन नहीं, बल्कि वह ज्ञान दिया है जो उसे जीवन भर सम्मान दिलाएगा। अर्जुन ने अपने पिता की ओर देखा और उनकी आँखों में गर्व के आँसू थे।