एक शांत गाँव में सोमू और रघु नाम के दो गहरे मित्र रहते थे। सोमू एक मेहनती किसान था और रघु एक व्यापारी। एक दिन रघु के मन में एक बुरा विचार आया। उसे सोमू की पत्नी मीना के प्रति गलत भावनाएं आने लगीं और वह उनके सुखी परिवार में हस्तक्षेप करना चाहता था.
जैसे ही रघु ने अपने गलत इरादों पर काम करना शुरू किया, उसकी शांति छिन गई। वह अब पहले जैसा खुश नहीं रहता था। जब भी वह सोमू को देखता, उसका दिल डर से धड़कने लगता। उसे अपने किए हुए पाप का बोझ महसूस होता, समाज में बदनामी का डर सताता और उसे इस बात का दुख होता कि कहीं सोमू उससे नफरत न करने लगे। घृणा, पाप, भय और अपमान—ये चार साये उसके पीछे पड़ गए थे।
रघु की बेचैनी देखकर सोमू ने पूछा, 'रघु भाई, तुम इतने परेशान क्यों दिख रहे हो?' रघु अब और नहीं छिप सका। उसने रोते हुए अपनी गलती स्वीकार कर ली। उसे समझ आ गया कि दूसरे के घर में झाँकने की कोशिश ने उसकी अपनी शांति छीन ली है। उसने अपने व्यवहार को सुधारा और सच्चाई के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया। तभी जाकर उसे चैन की नींद आई।