एक छोटे से गाँव में आर्यन नाम का एक मूर्तिकार रहता था। वह अपनी कला में बहुत निपुण था। एक दिन गाँव के एक धनी व्यापारी ने आर्यन से कहा, 'आर्यन, मेरे महल के लिए सुंदर मूर्तियाँ बनाओ, और बदले में मैं तुम्हें इतना सोना दूँगा कि तुम जीवन भर ऐश कर सकोगे।'
आर्यन ने सोचा कि उस सोने से वह एक बड़ा घर बना सकता है और बहुत आराम से रह सकता है। लेकिन फिर उसने देखा कि गाँव के बच्चे पढ़ने के लिए जगह नहीं पा रहे हैं और बीमार लोगों के पास दवाइयों के लिए पैसे नहीं हैं। उसने एक बड़ा निर्णय लिया। उसने उस धन का उपयोग गाँव में एक पाठशाला और एक अस्पताल बनाने के लिए किया। उसने अपने शरीर के आराम के बजाय समाज की भलाई को चुना।
समय बीतता गया। आर्यन बूढ़ा हो गया और उसका शरीर कमजोर हो गया। उसके पास धन भी कम हो गया। लेकिन, जो स्कूल और अस्पताल उसने बनाए थे, वे गाँव के लिए वरदान साबित हुए। लोग आर्यन के नेक कामों की चर्चा करने लगे। जब आर्यन इस दुनिया से चला गया, तब भी उसका नाम लोगों की जुबान पर था। उसका शरीर तो मिट्टी में मिल गया, लेकिन उसके अच्छे कर्मों से कमाया गया नाम हमेशा के लिए अमर हो गया।