एक शांत गाँव में आर्यन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत ही ईमानदार और दयालु था। उसी गाँव में विक्रम नाम का एक व्यक्ति रहता था। विक्रम गाँव वालों के सामने बहुत ही सज्जन होने का ढोंग करता था। वह बड़ों का सम्मान करता और गरीबों की मदद करने का दिखावा करता था।
एक बार गाँव में एक नया कुआँ खोदने का निर्णय लिया गया। विक्रम ने सबके सामने घोषणा की, 'मैं इस कुएँ के निर्माण के लिए बहुत सारा धन दान करूँगा।' गाँव वाले उसकी प्रशंसा करने लगे। लेकिन विक्रम के मन में कुछ और ही चल रहा था। वह घटिया सामग्री का उपयोग करके बाकी पैसे खुद रखना चाहता था।
आर्यन ने देखा कि विक्रम जब मुस्कुराता था, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी होती थी। उसका शरीर भी उसके शब्दों के साथ मेल नहीं खा रहा था। आर्यन ने अपने दादाजी से पूछा, 'दादाजी, विक्रम अंकल इतने अच्छे होने का नाटक करते हैं, फिर भी वे इतने परेशान क्यों दिखते हैं?'
दादाजी ने समझाया, 'बेटा, जब कोई व्यक्ति अपने भीतर के छल को छिपाने के लिए अच्छाई का मुखौटा पहनता है, तो उसके शरीर के तत्व भी उस झूठ पर हंसते हैं। उसकी बनावटी मुस्कान और शरीर की हलचल उसके असली इरादों को बता देती है।'
अंत में, विक्रम की धोखाधड़ी पकड़ी गई और गाँव वालों ने उसका बहिष्कार कर दिया। आर्यन ने सीखा कि सच्ची अच्छाई दिखावा नहीं, बल्कि मन और कर्म की पवित्रता है।