एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने पिता रवि के साथ रहता था। रवि की एक छोटी सी किराने की दुकान थी। रवि अपनी ईमानदारी के लिए पूरे गाँव में जाने जाते थे; वे हमेशा सही तौल और सही माप का ध्यान रखते थे।
एक दिन अर्जुन के मन में एक लालच आया। उसने सोचा, 'अगर हम सामान थोड़ा कम तौलें, तो बचा हुआ सामान हम बेच सकते हैं।' कुछ दिनों तक अर्जुन ने चुपके से तौल में हेराफेरी की। उसे लगा कि वह मुनाफा कमा रहा है, लेकिन उसके मन की शांति छिन गई। उसे हर समय डर लगा रहता था कि कहीं कोई पकड़ न ले।
एक दिन अर्जुन ने एक बूढ़ी महिला को कम सामान दिया। रवि ने अर्जुन के चेहरे पर घबराहट देख ली और उसे पास बिठाकर समझाया, 'बेटा, जो लोग दूसरों को धोखा देने की इच्छा रखते हैं, वे कभी भी जीवन के सही रास्ते पर अडिग नहीं रह सकते। असली धन पैसा नहीं, बल्कि लोगों का भरोसा है।' अर्जुन को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने रोते हुए माफी मांगी। उस दिन के बाद से अर्जुन ने हमेशा ईमानदारी से काम किया और उनकी दुकान गाँव की सबसे भरोसेमंद दुकान बन गई।