एक समय की बात है, विक्रम नाम का एक बहुत ही कुशल मूर्तिकार था। उसकी बनाई मूर्तियाँ इतनी जीवंत थीं कि लगता था जैसे वे अभी बोल पड़ेंगी। उस देश के राजा ने एक भव्य स्मारक बनाने का निर्णय लिया। राजा बुद्धिमान था, लेकिन उसकी एक कमी थी—वह चीजों को खुद देखने के बजाय दूसरों की बातों पर ज्यादा भरोसा करता था।
जब विक्रम ने मूर्ति पूरी की, तो मंत्रियों ने राजा के पास जाकर कहा, 'महाराज, मूर्ति अद्भुत है! यह अब तक की सबसे सुंदर कृति है!' राजा ने मूर्ति को स्वयं देखा नहीं, बस मंत्रियों की प्रशंसा सुनकर उसे महान मान लिया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद, मूर्ति के आधार में एक दरार आ गई। मंत्रियों ने केवल बाहरी सुंदरता देखी थी, लेकिन मूर्ति की मजबूती पर ध्यान नहीं दिया। जब राजा को यह पता चला, तो उसे बहुत पछतावा हुआ। उसे समझ आया कि केवल दूसरों की मीठी बातों (कानों) पर भरोसा करके सत्य का पता नहीं लगाया जा सकता। असली परख तो वस्तु के गुण को स्वयं अनुभव करके ही की जा सकती है।