एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत ही ईमानदार था। एक दोपहर, अपने पिता की मिट्टी के बर्तन की दुकान में खेलते समय, अर्जुन से गलती से एक छोटा सा मिट्टी का पात्र टकरा गया और उसमें एक छोटी सी दरार आ गई। वह दरार इतनी छोटी थी कि शायद ही कोई उसे देख पाता। अर्जुन के मन में आया, 'अगर मैं इसे छिपा लूँ, तो किसी को पता नहीं चलेगा।'
लेकिन जैसे-जैसे शाम हुई, अर्जुन का मन बेचैन होने लगा। उसे लगा कि भले ही वह दरार छोटी है, लेकिन झूठ बोलना बहुत बड़ा पाप होगा। उसने हिम्मत जुटाई और अपने पिता के पास गया। उसने रुआँसे स्वर में कहा, 'पिताजी, मुझसे गलती से इस बर्तन में दरार आ गई है। मुझे माफ कर दीजिए।'
उसके पिता ने उसे गले लगा लिया और प्यार से कहा, 'अर्जुन, बर्तन की वह दरार तो बहुत छोटी है, लेकिन तुम्हारी ईमानदारी एक विशाल पेड़ की तरह बड़ी है। जो व्यक्ति छोटी सी गलती पर भी शर्म महसूस करता है, वही सच्चा इंसान है।' अर्जुन को बहुत सुकून मिला। उसने सीखा कि सच बोलना ही सबसे बड़ी ताकत है।