एक सुंदर से गाँव में आर्यन और मीरा नाम के दो दोस्त रहते थे। एक दिन उन्होंने मिलकर लकड़ी का एक बड़ा घर बनाने का फैसला किया। आर्यन बहुत उत्साहित था। 'चलो, अभी से बनाना शुरू करते हैं!' वह चिल्लाया और हथौड़ा लेकर दौड़ पड़ा।
लेकिन मीरा थोड़ी समझदार थी। उसने कहा, 'रुको आर्यन! क्या हमारे पास पर्याप्त लकड़ी है? क्या हमने सोचा है कि घर मजबूत बनेगा या नहीं? हमें पहले एक नक्शा बनाना चाहिए।'
आर्यन ने उसकी बात नहीं मानी। 'हम काम करते-करते सोच लेंगे!' कहकर उसने लकड़ियाँ जोड़नी शुरू कर दीं। मीरा ने उसकी मदद नहीं की क्योंकि उसके पास कोई योजना नहीं थी।
कुछ दिनों बाद, घर आधा ही बना था, लेकिन वह टेढ़ा-मेढ़ा था और हवा चलते ही हिलने लगा। इतना ही नहीं, काम के बीच में ही आर्यन के पास कीलें खत्म हो गईं। आर्यन उदास होकर बैठ गया। 'काश! मैंने पहले ही इसके बारे में सोच लिया होता,' उसने पछताते हुए कहा।
मीरा उसके पास आई और प्यार से बोली, 'आर्यन, किसी भी काम को शुरू करने से पहले उसके बारे में गहराई से सोचना चाहिए। काम शुरू करने के बाद यह कहना कि 'मैं बाद में सोचूँगा', केवल मूर्खता है।' आर्यन को अपनी गलती समझ आ गई। अगली बार उन्होंने मिलकर योजना बनाई और एक बहुत ही सुंदर घर बनाया।