बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध राज्य की सीमा पर 'मरकतपुरी' नाम का एक भव्य किला था। उस किले की दीवारें बहुत ऊँची थीं और उसके चारों ओर गहरी खाई थी। उस राज्य का राजकुमार विक्रम बहुत बहादुर था, लेकिन उसकी एक कमी थी—वह बहुत जल्दबाज था।
एक बार पड़ोसी राज्य के राजा ने मरकतपुरी पर हमला करने की योजना बनाई। विक्रम के सेनापति ने सलाह दी, 'राजकुमार, हमें किले की सुरक्षा का लाभ उठाना चाहिए। यदि हम किले के भीतर से हमला करेंगे, तो हमें बहुत फायदा होगा।' लेकिन विक्रम ने जिद में आकर कहा, 'मुझे किले की जरूरत नहीं है, मैं खुले मैदान में जाकर दुश्मनों का सामना करूँगा!'
विक्रम की जिद के कारण युद्ध खुले मैदान में हुआ। किले की सुरक्षा के बिना, विक्रम की सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। विक्रम हार मानकर दुखी मन से किले में वापस लौट आया।
उसके पिता, राजा राजेंद्र ने उसे समझाया, 'विक्रम, चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, जीत तभी मिलती है जब सही जगह का चुनाव किया जाए। किले जैसी सुरक्षित जगह का उपयोग करके हमला करने से न केवल सुरक्षा मिलती है, बल्कि जीत भी सुनिश्चित होती है।'
विक्रम को अपनी गलती समझ आ गई। अगली बार जब चुनौती आई, तो उसने किले की रणनीतिक स्थिति का उपयोग किया। किले की मजबूती ने उसके सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और वे विजयी हुए।