बहुत समय पहले की बात है, एक शांत गाँव में आचार्य देवदत्त रहते थे। वे सभी को धर्म, नैतिकता और ज्ञान की शिक्षा देते थे। गाँव में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन तभी कुछ लालची व्यापारियों ने गरीब किसानों की ज़मीन हड़पना शुरू कर दिया। वे अपने धन और प्रभाव का उपयोग करके सच्चाई को दबाने लगे। आचार्य देवदत्त चिंतित थे, क्योंकि उन्हें पता था कि बिना किसी शक्ति के, केवल ज्ञान से अन्याय को नहीं रोका जा सकता।
वे राजा विक्रम के पास सहायता के लिए गए। राजा अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे। राजा ने तुरंत मामले की जाँच करवाई और दोषियों को दंडित किया। किसानों को उनकी ज़मीन वापस मिल गई। आचार्य ने महसूस किया कि ज्ञान और धर्म तभी तक सुरक्षित हैं जब तक राजा का न्यायपूर्ण शासन उन्हें सहारा देता है। राजा की शक्ति ही वह आधार थी जिसने सच्चाई और धर्म की रक्षा की।