बहुत समय पहले, विक्रम नाम का एक दयालु राजा एक समृद्ध राज्य पर शासन करता था। एक दिन, अर्जुन नाम का एक युवक महल से एक कीमती आभूषण चुराने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया। सिपाहियों ने उसे राजा के सामने पेश किया।
दरबारी चिल्लाने लगे, 'इसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए!' लेकिन राजा विक्रम शांत थे। वे सोच रहे थे, 'एक किसान जब अपने खेत से खरपतवार (weed) निकालता है, तो वह बहुत सावधानी बरतता है ताकि फसल को नुकसान न पहुँचे। ठीक उसी तरह, एक राजा को अपराधी को सजा देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि अपराधी का जीवन नष्ट न हो जाए, बल्कि केवल उसकी बुराई नष्ट हो।'
राजा ने अर्जुन को मृत्युदंड देने के बजाय सुधार का एक अवसर दिया। राजा ने कहा, 'अर्जुन, तुमने गलती की है, लेकिन मैं तुम्हें सुधरने का मौका देता हूँ। तुम्हारी सजा यह है कि तुम एक साल तक गाँव के गरीबों की सेवा करोगे।'
अर्जुन को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने सेवा भाव से काम किया और एक नेक इंसान बन गया। राजा की दया ने एक अपराधी को समाज का सम्मानित नागरिक बना दिया।